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माँ

माँ गर्भ में अपना खूनपिलाती
गोद में अपना दूध पिलाती
छोटे बालक से युवक बनाती
नित ममता का सागर बहाती

पेट स्तन में लात घूसे मारता
फिर भी अमृत दूध पिलाती
फिर भी दुलार स्नेह लहराता
सुला सूखे में गीले मे सो जाती
नित नेह का बादल बरसाती

माँ अटूट अवर्णीय बंधन है
ओर छोर का विस्तृत क्षितिज है
मेरी प्रगति में ही सुख पाती है
नित प्यार आशीर्वाद लुटाती है

पापा की मार डाट से बचाती
माँ मेरी ढाल बन मुझे गले लगाती
मेरे जीवन कुंड की माँ वह आहुति
बार बार जल स्वर्ण सा निखारती

डाँ मधु पाराशर
शान्ति निकेतन कालेज
प्रचार्य
आगरा

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